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Homeदेहरादूनछात्रसंघ चुनाव: युवा लोकतंत्र ने दी दस्तक, निर्दलीयों की भी हुई सुनवाई

छात्रसंघ चुनाव: युवा लोकतंत्र ने दी दस्तक, निर्दलीयों की भी हुई सुनवाई

उत्तराखंड के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्रसंघ चुनाव 2025-26 महज़ मतगणना का नहीं, बल्कि उस बेचैनी और उम्मीद का दिन बन गया, जब युवा लोकतंत्र ने कक्षा छोड़कर कैम्पस में कदम रखा। बैलेट बॉक्स पर लगी मुहरों ने नारेबाज़ी से ज़्यादा कुछ कह दिया कि राजनीति अब सिर्फ नेतागीरी नहीं, बल्कि हिस्सेदारी की भी ज़मीन बन रही है।
शुक्रवार को सुबह 8 बजे से लेकर दोपहर 2 बजे तक चले मतदान में छात्र-छात्राओं ने लाइन में खड़े होकर लोकतंत्र के भविष्य को वोट दिया। पुलिस की तैनाती थी, लेकिन माहौल में उत्सव जैसा जोश भी था। कुछ जगहों पर गुटबाज़ी दिखी, तो कहीं चुपचाप खामोशी से उंगलियां स्याही में डूबीं।
देहरादून का डीएवी पीजी कॉलेज, जिसे एबीवीपी का अभेद गढ़ माना जाता रहा है, वहां पिछले साल आर्यन संगठन ने दीवार में सेंध लगाई थी। 14 साल का विजयरथ थमा था। इस बार एबीवीपी ने ऋषभ मल्होत्रा के रूप में वापसी की और वो भी धमाकेदार। एनएसयूआई के हरीश चंद्र जोशी को 657 वोटों से हराकर ऋषभ ने सिर्फ चुनाव नहीं, सम्मान भी वापस पाया।
सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय, अल्मोड़ा में एनएसयूआई के लोकेश सुप्याल ने एबीवीपी के दीपक लोहनी को 341 मतों से हराया। एकतरफा जीत थी, लेकिन इसके पीछे की मेहनत एकतरफा नहीं थी। हर पोस्टर, हर कैम्पेन, हर अपील इस बात की गवाही दे रही थी कि यहां छात्रों ने संगठन को नहीं, उम्मीदवार को चुना।
थलीसैंण में भी एनएसयूआई ने बाजी मारी है, 6 में से 5 पदों पर एनएसयूआई का कब्जा और एकमात्र उपाध्यक्ष पद पर एबीवीपी का जीतना बताता है कि युवाओं के वोट किसी संगठन के नाम से नहीं, प्रदर्शन से तय हो रहे हैं।
यहाँ महिपाल बिष्ट ने 664 मतों से जीत दर्ज की। श्रीनगर में एबीवीपी का परचम फिर से लहराया। एक बार फिर साबित हुआ कि छात्रसंघ चुनाव सिर्फ नंबर का खेल नहीं, भावना की परीक्षा भी है।
एनएसयूआई के हर्ष मोहन राणा ने 555 मतों से जीत दर्ज की। एबीवीपी के स्वास्तिक कुकरेती को 495 वोटों पर ही संतोष करना पड़ा। महासचिव पद पर आर्यन संगठन के प्रियांशु कोटनाला की जीत ने यह जता दिया कि राजनीति अब बहुकोणीय हो चली है।
डीएसबी परिसर में करन सती ने एबीवीपी के तनिष्क मेहरा को 249 मतों से हराया। कोई संगठन नहीं, कोई पोस्टर नहीं, बस चेहरा और काम। करन की जीत से यह संदेश गया कि छात्र राजनीति अब भी उम्मीदों की ज़मीन पर खड़ी है जहाँ पार्टी से ज़्यादा पहचान चलती है।
रुद्रप्रयाग के अगस्त्यमुनि कॉलेज में एबीवीपी का सूपड़ा साफ हो गया। प्रियांशु मोहन ने अध्यक्ष पद पर 236 मतों से जीत हासिल की और बाकी सभी पदों पर भी निर्दलीय उम्मीदवारों ने कब्जा जमाया।
एनएसयूआई की बिपाशा ने शिवानी रावत को हराकर अध्यक्ष पद पर जीत हासिल की। महिला प्रत्याशियों ने सभी प्रमुख पदों पर कब्जा जमाकर यह बता दिया कि राजनीति अब ‘लड़कों की चीज़’ नहीं रही।
गैरसैंण में एबीवीपी के बद्री प्रकाश ने एनएसयूआई के हिमांशु को हराया, वहीं डोईवाला में अमित कुमार ने अध्यक्ष पद पर 50 वोटों से जीत हासिल की। एबीवीपी ने यहां संगठनात्मक मजबूती का परिचय दिया।
एक दशक से सत्ता से बाहर रही एबीवीपी ने कोटद्वार में अध्यक्ष से लेकर कोषाध्यक्ष तक सभी पदों पर जीत दर्ज की। एनएसयूआई को सिर्फ सचिव पद मिला। लेकिन कभी-कभी एक भी पद, बहुत कुछ कह जाता है।
उत्तराखंड के छात्रसंघ चुनावों ने साफ कर दिया कि युवा अब संगठन से सवाल भी करता है और उसे बदल भी सकता है। एबीवीपी और एनएसयूआई के बीच कांटे की टक्कर में कई जगह निर्दलीयों ने सेंध मारी। कोई लहर नहीं थी बल्कि हर कॉलेज में मुद्दे थे, उम्मीदवार थे, और छात्रों की अपनी-अपनी सोच थी। यह जीत हार से ज़्यादा एक जनसंकेत है कि लोकतंत्र की सबसे ताज़ी सांसें आज भी विश्वविद्यालयों में चल रही हैं।

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