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राजनीतिनामा : क्यूँ उत्तराखंडियत दांव पर लगा, हरदा ने बगावत से पीछे खींचे कदम…. “नौ दिन चले अढ़ाई कोस“

“नौ दिन चले अढ़ाई कोस“ शायद हिन्दी के इस मुहावरे का वाक्य प्रयोग, पूर्व सीएम हरीश रावत की हालिया कुछ दिनों की दौड्भाग से बेहतर नहीं हो सकता है | नाराजगी दिखाते उनके सोशल मीडिया पोस्टों से कॉंग्रेस मचे हो हल्ला और सिर फुट्टोवल के बाद उनके समर्थकों को विश्वास था कि रावत जी दिल्ली से सीएम चेहरा बन कर उठेंगे या पार्टी से ठन कर उठेंगे |  लेकिन स्थिति ढाक के तीन पात वाली ही रही, जब रावत दिल्ली गए थे तब वह पार्टी की चुनाव प्रबंधन समिति के प्रमुख थे और अब वापिस लौटे हैं तो अब भी उसी पद पर बने हुए हैं |  हालांकि यह बात अलग है कि हरदा अपने समर्थकों के उत्साहवर्धन के लिए इसे जीत की तरह पेश कर हैं |

न जाने क्या बात है कि देहारादून से दिल्ली जाते जाते लगता है हरदा के उत्तराखंडियत के गुब्बारा की हवा निकल गयी | तभी तो कल तक उत्तराखंड की चाहत बनने का ढ़ोल स्वयं पीटने वाले रावत, चुनावी वैतरणी में पार्टी द्धारा उनके हाथ बांधे होने का दर्द सोशल मीडिया में बयां करने के बाद ऐसा क्या हो गया दिल्ली आलाकमान से मुलाक़ात के बाद बाहर निकालकर विक्टरी शाइन दिखाने लगे | कल तक उत्तराखंडियत, उत्तराखंड की चाहत, हर दम हरदा संग जैसे कई कैम्पेन सोशल मीडिया पर चलाने वाले अब आगामी चुनाव समूहिक नेत्रत्व के साथ जाने का बयान दे रहे हैं | समझ से परे है कि एक और उनके समर्थक टिकट वितरण, चुनाव प्रबंधन में उनके हाथ के ऊपर होने की बात कर रहे हैं, जबकि चुनाव प्रबंधन समिति के प्रमुख की हैसियत होने के चलते ऐसा तो पहले भी संभव था तो फिर अब विद्रोही तेवरों के बाद दिल्ली से वापिसी में नया क्या है ? उम्मीद है कि हरीश रावत की दिल्ली वापिसी को उनके समर्थक सेलिब्रेट कर उनकी जीत के रूप में पेश करने की कोशिश करें |

राजनैतिक जानकारों का मानना है कि हरदा और टीम 10 जनपथ को एक दूसरे की कमजोरी और ताकत का बखूबी अंदाज़ा है | एक और हरदा की उम्र अधिक विरोध कर पार्टी से अलग रास्ता चुनने की इजाजत नहीं देती वहीं आलाकमान को भी राज्य में अपनी हैसियत का एहसास है |  यही वजह है कि दोनों और से युद्ध विराम की मौखिक शर्तों के साथ फिलहाल ऊपरी तौर पर शांति नज़र आ रही है, लेकिन जैसे जैसे टिकट वितरण और प्रचार ज़ोर पकड़ेगा एक बार फिर से पार्टी का गुटीय संघर्ष सतह पर आना तय है |

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