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क्या वजह थी गांधी जी के इन तीन विवादित फैसलों के पीछे, जिसने देश की तस्वीर ही बदल दी….गांधी जयंती पर कुछ इस पर भी गौर करने की जरूरत

गांधी जी आज भी निर्विवाद रुप में भारत ही नही दुनिया के सबसे लोकप्रिय शख्शियतों में शुमार हैं । वर्तमान में भी कोई उनकी मुखर आलोचना की कल्पना नही कर सकता है विशेषकर राजनैतिक परिदृश्य में । बावजूद इसके गांधी जी के कुछ निर्णय विवाद का विषय बने और इन्ही फैसलों ने देश में राजनीति की धारा ही बदल दी। आप शायद इन फैसलों से वाकिफ भी होंगें, लेकिन याद ताजा करने के लिए ही सही एक नज़र डालते हैं ऐसे तीन प्रमुख विवादित निर्णयों पर 

नेहरू को प्रधानमंत्री बनवाने के लिए पटेल को हार मानने के लिये मजबूर करना
चूंकि ब्रिटिश सरकार ने आज़ादी के तय किया था कि भारत की आने वाली अंतरिम सरकार का प्रधानमंत्री कांग्रेस अध्यक्ष को ही बनाया जाएगा | लिहाजा 29 अप्रैल 1946 को कांग्रेस कार्य समिति की महत्वपूर्ण बैठक नया अध्यक्ष चुनने के लिए बुलाई गयी । बैठक में महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, आचार्य कृपलानी, राजेंद्र प्रसाद, खान अब्दुल गफ्फार खान जैसे सभी प्रमुख नेताओं की मौजूदगी में अध्यक्ष पद के लिए 15 में से 12 प्रांतीय कमेटियों ने सरदार पटेल का नाम प्रस्तावित किया था । कांग्रेस अध्यक्ष के लिए मैदान में दो नाम थे पटेल और नेहरू । लेकिन गांधी की इच्छा के मुताबिक अध्यक्ष पद के लिए नेहरू के नाम का भी प्रस्ताव रखा गया और पटेल को नैतिकता में अपना नाम वापिस लेना पड़ा । उसके बाद सभी जानते हैं आज़ाद भारत की आंतरिक और विदेश नीति पर उसका क्या प्रभाव पड़ा जिसके चलते हमे सॉफ्ट स्टेट के रूप में जाना गया |

गांधी जी के इस निर्णय के पीछे की वजह

दरअसल गांधी जी के मन नेहरू के प्रति सॉफ्ट कोर्नर होना जगजाहिर था | उन्हे नेहरू की विदेशी शिक्षा, ब्रिटिश अधिकारियों से सम्बंध और नरम नीति पर अधिक भरोसा था | वहीं पटेल सिद्धांतों और नीतियों को लेकर बेहद दृढ़ थे जो किसी तरह से गांधी जी को मंजूर नहीं था |

दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष बनने से रोककर देश के असल नेता जी को देश की राजनीति में अलग थलग करना
देश नेता जी सुभाष चंद्र बोस की नेत्रत्व क्षमता का उस समय कायल हो गया था जब से 1938 में वह कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए । लेकिन उनकी कार्यशैली और अंग्रेजों के साथ जैसे को तैसा वाली व्यवहारिक राजनैतिक तौर तरीके गांधी जी को मंजूर नहीं थे | गांधी के साथ उनके मतभेद इतने बड़ गए कि जब 1939 को त्रिपुरी अधिवेशन में गांधी जी के उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैया को हराकर दोबारा अध्यक्ष बने तो गांधी जी ने इसे सार्वजनिक तौर पर इसे अपनी हार माना । विरोधस्वरूप गांधी जी कांग्रेस वर्किंग कमेटी से अलग हो गए । लिहाजा गांधी जी के सम्मान और इच्छा अनुशार नेता जी ने अखिल भारतीय कांग्रेस कार्यसमिति की कलकत्ता बैठक में इस्तीफा दे दिया। उन्हे गांधी के विरोध के चलते पार्टी में अलग थलग कर दिया गया | इसी दौरान उन्होने कांग्रेस के अंदर ही अपनी पार्टी फॉरवर्ड ब्लॉक बनाई ।

नेता जी को लेकर गांधी जी के विरोध की वजह

बोस को लेकर गांधी जी को हमेशा उनके उग्र विचारों को लेकर आशंका थी | उन्हे कॉंग्रेस में वही लोग पसंद थे जो उनकी संत परंपरा की तरह आज़ादी के आंदोलन चलाने की राय रखते हों या स्पष्ट शब्दों में कहें तो जो उनकी हाँ में हाँ मिलाएँ | पार्टी के अंदर और बाहर नेता जी की बढ़ती लोकप्रियता भी गांधी जी के इर्दगिद प्रमुख नेताओं को रास नहीं आ रही थी |

गांधी जी क्या वाकई क्रांतिकारी भगत सिंह को बचा सकते थे ?
भगत सिंह ने अपने साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ दिल्ली में केंद्रीय असेंबली में बम फेकने के आरोप में फांसी के काफी करीब थे | उनकी फांसी से 17 दिन पहले महात्मा गांधी के नेत्रत्व में कॉंग्रेस और वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच सम्झौता हुआ | जिसकी प्रमुख शर्तों में थी हिंसा के आरोपियों को छोड़कर बाकी सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा किया जाना । आरोप है कि भगत सिंह की मौत की सजा को कम करके उम्र कैद में बदलने के लिए उन्होंने अपील नहीं की थी।

भगत सिंह को लेकर गांधी जी की राय
गांधी जी का स्पष्ट कहना था कि भगत सिंह और उनके साथियों ने आज़ादी के लिए जो रास्ता चुना है वह गलत और असफल है । चूंकि वह उनके तौर तरीकों से असहमत थे इसलिए उनकी उन्हे बचाने की कोशिशें भी आधी अधूरी नज़र आती हैं

फिलहाल गांधी जी के ऐसे विवादित फैसलों को सही या गलत ठहराने की ज़िम्मेदारी आप सबकी अलग अलग है लेकिन इतना तय है कि यदि नेता जी सुभाष चंद्र बॉस, सरदार पटेल और भगत सिंह आने वाले कुछ दशकों तक देश में प्रभावी भूमिका निभाने की स्थिति में होते तो भारत की तस्वीर निसंदेह अलग और प्रभावशाली होती |

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