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Homeहल्द्वानीभाजपा संगठन में बढ़ती अंतर्कलह

भाजपा संगठन में बढ़ती अंतर्कलह

कभी सोशल मीडिया पर सन्नाटा पसरा रहता था, अब वहाँ नारे कम, नारेबाज़ियाँ ज़्यादा हैं। कुमाऊँ की वादियों में एक बार फिर राजनीतिक तापमान चढ़ा हुआ है पर ये ताप इस बार जनता की आवाज़ से नहीं, बल्कि भाजपा संगठन के भीतर सुलग रही उस आग से है जो अब धुएँ की शक्ल में सोशल मीडिया पर दिखने लगी है।
हक़ीक़त ये है कि हल्द्वानी से लेकर देहरादून तक, भारतीय जनता पार्टी की तस्वीर अब एकजुटता की नहीं, बल्कि दो गुटों की लड़ाई की बनती जा रही है।
बाहर से देखिए तो सब ठीक-ठाक नज़र आएगा कार्यकर्ताओं की चुप्पी, नेताओं की चुपचाप मीटिंग्स और ऊपर से बयानबाज़ियों की बंदिशें। लेकिन अंदर ही अंदर कुछ ऐसा चल रहा है जिसे समझने के लिए राजनीति की बारूद को सूंघने वाला नाक चाहिए और कुछ पत्रकारों के पास ये नाक होती है।
सोशल मीडिया की जंग में इन दिनों पोस्टों में कटाक्ष छिपे हुए हैं, और लाइक्स व कमेंट्स से गुटों की गिनती हो रही है। मज़े की बात ये है कि हर कोई सब जानता है फिर भी कोई कुछ कहता नहीं। हाँ, मजा जरूर लेता है।
प्रदेश नेतृत्व तक भी ये आग पहुंच चुकी है। शायद इसी आग को बुझाने के लिए नैनीताल ज़िलाध्यक्ष प्रताप बिष्ट को एक पत्र जारी करना पड़ा और वो भी किसी कार्यकर्ता को नहीं, बल्कि पदाधिकारियों को चेतावनी देते हुए। पत्र में पार्टी की अनुशासित छवि की दुहाई दी गई और सोशल मीडिया पर बेवजह मुहिम चलाने वालों पर सख़्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।
लेकिन सवाल ये है कि अगर सबकुछ सही होता तो ऐसी चेतावनी की ज़रूरत ही क्यों पड़ती?
अगर पार्टी एकजुट होती, तो सोशल मीडिया की ज़मीन पर दरारें क्यों दिखतीं? अगर संगठन मज़बूत होता, तो कार्यकर्ता मौन होकर तमाशा क्यों देखते?
दरअसल, ये वो चुप्पी है जो बहुत कुछ कहती है।
बता दे कि बीते दिनों पूर्व मुख्यमंत्री व वर्तमान सांसद त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने प्रदेश में अवैध खनन पर सवाल उठा दिए। संसद में सीधे-सीधे सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। मामला अखबारों की सुर्खी बना और सरकार की खूब किरकिरी हुई। हालाकि य़ह मामला अब ठंडे बस्ते में है लेकिन ठीक इसके बाद अब सोशल मीडिया की जंग ने सरकार व संगठन को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
कुल मिलाकर स्थिति य़ह बया कर रही है कि, पत्रों से आग नहीं बुझती।
चुप्पी से दरारें नहीं मिटतीं।
और सोशल मीडिया पर चलती जंगें कभी महज़ संयोग नहीं होतीं।
जो सवाल आज सोशल मीडिया से उठ रहे हैं, वही कल जनता के बीच पहुँचेंगे। आज जो चुटकी है, कल वो चुनावी चोट बन सकती है। और तब कोई पत्र काम नहीं आएगा न अनुशासन, न निर्देश। अभी भी वक्त है। धुआँ देखकर इनकार करने के बजाय, आग को पहचानिए।
क्योंकि यह आग अब केवल संगठन की नहीं, सरकार की साख पर भी सवाल खड़े कर रही है।

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